२० आश्विन २०७९, बिहीबार
बि प्लस नेपाल

का हए गुरही पर्व ?

खबर सम्बाददाता १८ श्रावण २०७९, बुधबार
का हए गुरही पर्व ?

भानु प्रताप राना

धनगढी, १८ सामन

पश्चिमा थारु समुदाय एकएसंग गुरही मनाइ हए । धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व रहो गुरही तिउहार चौधरी थारु गाउँमे भव्यताके साथ मनात हएँ । दाङसे लैके पश्चिम कञ्चनपुरतकके चौधरी थारु समुदायकसे मनान बालो पर्वमे गुरही पर्व विक्रम संवत अनुसार पहिलो तिउहार हए कहेसे थारू संवत अनुसार तिसराे पर्व पडत हए ।

थारु समुदायकी पर्वकी शुरुवातके रुपमे गुरहीपर्वके लेओ करत हएँ । नागपञ्चमीके दिन जा पर्व देशभरके थारु समुदाय धुमधामसे मनाओ करत हएँ । थारु समुदायमे ‘गुरही’ मनानकी अर्थ, नाग बाबाके पुजा करसे दुसरे साँप, बिछी घरमे नाआन, घरमे आगलागी नाहोन, दुःख कष्ट हटन, रोगव्याधी ओ महामारी घरमे प्रवेश नाकरत हए कहिके विश्वास करोजात हए ।

कैसे मानत हए गुरही ?

चौधरी थारु समाजमे जा तिउहार ओर पूजासे कुछ फरक मेलकी मानत हएँ । परापूर्व कालसे मनात आए थारु समाजके पहिलो तिउहारके रुपमे ‘गुरही’के लेत हएँ । खेतीपाती उसारके सबजनै घरएम फुर्सत बैठे समयमे आनिया जा तिउहार साउन शुक्ल पञ्चमीमे पडनसे जाके नागपञ्चमीके रुपमे फिर चिनत हएँ । थारु समाजमे ‘गुरही, गुर्या’ कहिके मनानबालो जा पर्व नेपाली भाषामे नागपञ्चमी कहिके मनानबालो दुने तिउहार एकए हए । नागपञ्चमीमे विशेष करके नेपाली नाग देवताकी पूजा करत हएँ कहेसे चौधरी समाजमे ‘गुरही’ पूजा करत हएँ । पर ठिहा अनुसार गुरही मनानकी प्रचलन फिर थारु समाजमे फरक फरक हए ।

वर्ष भरेक खान ताँही खेतीपातीमे सेहर भए थारु समाज जब किंचसे निकरके आत हएँ तबही आनबालो गुरही तिउहार थारु समाजके पहिलो तिउहारके रुपमे चिरपरिचित हए । साँझके समयमे जब गइयाा बर्धा घरे बाँधके तव गावके अगुवा ९भल्मन्सा , चाकर० के पहलमे गाावके ददाभैया ओर दिदीवहिनिया नयाँ नयाँ कपडा पैधके थरियामे मेमेलके भुजा, दुब घाँस, रंग बिरंगकी गुडिया लैके गुरही–गुरहा ठठान बिच्चामे जात हएँ । खास करके गाावकी चौराहोमे ठठानदालो गुरहीमे गाँवभरेक युवा–युवती ओर बुढे जमान औ बच्चा चौराहोमे जमा होत हएँ ।?दचश्रजब गाँवक भलमन्सा एक सांसमे दुबकी घाँसम गाँठी बाँधके या फिर एक गुडिया बनोभओ चिरकुटमे गाँठी बनाएके गुरहीगुरहा ठठानकी कहात हए तओ हुनए रहेभए लौडा लौंडिया लट्ठीसे , बेरसरमासे मारके “घुघरी डेउ” “घुघरी डेउ” कहात हए । ऐसे मारनसे गाँवमे रहे रोगव्याधी ओर डैनी,भूत सब नास हुइजात हएँ थारुसमाजमे जनविश्वास हए ।

गुरही ठठाएके अपन लाओभओ मेलमेलकी खानी चीज जैसे– जुन्ना लवा, चना, मटरा, भुजा एक–एक चोटी प्रसादके रुपमे बँट्त हएँ । जवतक थरियाके मिान खतम नम होत हएँ तबतक बच्चा “भुजा देओ, भुजा देओ कहात पिछा लागे रहात हए। । ऐसिए ठठाई भइ गुडिया और गुरही ओ रंग विरंगकी चिर, अपन घरे लैजानसे द्धारोम बाँधनसे घर रहो दुःख चिन्ता दूर हुइजात हए औ दुब,भुजा घरकी छानीम फेकनसे घरमे रहे साँप, बिछी बाहिर निकरजात हएँ थारु समाजमे पुरानी जनविश्वास कायम हए ।

गुरही–गुरहा ठठाएके नदिया या कुलाम पोहात हएँ । जक मतलब बिनके मारके दाह संस्कार करो महसुस करत हएँ । समाजकी दुश्मनकी रुपमे रही डैनी भुत प्रेत गाावकी चौराहोमे मारपिट करके दाहसंस्कारके ताँही नदियामे पोहानसे गाँवमे फिर दुःख देन कभु ना आत हए कहिके सामुहिक रुपमे पोहात हएँ ।

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